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एक दिशाहीन आंदोलन

 

 

अन्ना हजारे, अरविंद केेजरीवाल और वाइको जैसे राजनीतिज्ञों के साथ मंच साझा करके क्या संदेश देना चाहते है। केजरीवाल को बड़े विश्वास के साथ दिल्ली की जनता ने सत्ता सौंपी है, लेकिन जब भी उन्हें आंदोलन का मंच दिखता है तो उनका मूल स्वभाव फिर वापस लौट आता है। अन्ना को केजरीवाल की क्या आवश्यकता है। यदि वे किसानों का मुद्दा उठाना चाहते हैं तो उन्हें किसानों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। भूमि अधिग्रहण कानून पर बड़ा आंदोलन आवश्यक है। अन्ना को इसमें दूसरे लोगों को भी जोडऩा चाहिए।

  • मयंक चौहान, ग्वालियर

लकीर पीटने से क्या फायदा

भोपाल गैस कांड में कानूनी कार्रवाई करने का वक्त तो उसी दिन था जब उन पंद्रह हजार मासूम मौतों का हत्यारा एंडरसन भोपाल के एक रेस्टहाउस में ठहरा हुआ था। उसे उसी वक्त दबोचना था और उन हत्याओं का दोष लगाते हुए सजा देना था। लेकिन एंडरसन को तो किसी मेहमान की भांति पूरे सम्मान-हिफाजत के साथ सरकार का हवाई जहाज प्रदान कर सुरक्षित देश से बाहर निकाल दिया। वे लोग बिलखते और रोते रह गए। अनगिनत जानें जा चुकी हैं और जो जिंदा हैं उनकी आंखों में वह दर्द भरा मंजर अभी भी ताजा है। अब चाहे मोती सिंह पर आरोप लगाओ या स्वराज पुरी पर इससे क्या लाभ होगा। न्याय में देर अंधेर ही कहलाती है। भोपाल गैस त्रासदी में यह अंधेर हो चुकी है।

  • उमेश सिंह, भोपाल

सुरक्षा मेें सेंध

वित्त, रक्षा, पेट्रोलियम, कोयला, ऊर्जा सहित तमाम मंत्रालयों में जासूसी का मकडज़ाल डरावना सच है। यह सारे मंत्रालय देश की सुरक्षा और आर्थिक मामले से जुड़े हुए हैं। इनकी गोपनीयता भंग होना, महत्वपूर्ण कागजात चोरी होना गंभीर अपराध है। एक ऐसा अपराध जिसकी जड़ बड़े अधिकारियों के बीच छिपी हुई है। लेकिन गिरफ्तार छोटे लोगों को किया गया है।

  • ममता प्रसाद, इंदौर

राहुल क्यों गए?

राहुल गांधी परिपक्व राजनीतिज्ञ नहीं बन पा रहे हैं। राजनीति उनके खून में है लेकिन उनका मिजाज अलग है। वे खुलकर काम करना चाहते थे, उन्हें मौका नहीं दिया गया। राजनीति में ऐसा ही होता है। अवसर मिलते नहीं बल्कि बनाने पड़ते हैंं। बजट सत्र के दौरान ऐसे अनेक अवसर थे जब राहुल सत्ता पक्ष पर तीखा वार कर सकते थे, वे तो अज्ञातवास में चले गए। क्या उन्हें इन बिगड़ते हालातों में भी कांगे्रस अध्यक्ष का पद महत्वपूर्ण लग रहा है। यदि ऐसा है तो यह बहुत दुखद है।

  • नंजय पाटिल, उज्जैन

यह नाटक किस लिए

नीतिश को वापस आना ही था तो सत्ता क्यों छोड़ी। ऐसे बलिदान का क्या मतलब, सत्ता की लालसा का यह घिनौना प्रदर्शन है। मांझी ने यह तो नहीं कहा था कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाए। वे तो नीतिश की ही खोज थे। अचानक चंद महीनों में ही नीतिश की नजर में वह व्यक्ति इतना क्यों गिर गया? क्या महज इसलिए कि वह महादलित है। दलितों के साथ यह समाज, यह राजनीति किस तरह का सलूक करती है मांझी प्रकरण से स्पष्ट समझा जा सकता है। भाजपा ने भी मांझी को केवल मोहरा बनाया। परदे के पीछे से सारा खेल खेला और मांझी भाजपा के झांसे में आकर कठपुतली बनने पर मजबूर हुए।

  • रमेश पासवान, पटना

जरा संभलकर

भाजपा कश्मीर से कन्याकुमारी तक सत्ता पाने के लिए इस कदर बौरा गई है कि उसने अपने सिद्धांत और लक्ष्य भुला दिए हैं। पीडीपी से तालमेल कहीं ऐतिहासिक गलती साबित न हो जाए। महबूबा मुफ्ती  अपहरण कांड से लेकर आज तक मुफ्ती मोहम्मद सईद का इतिहास धोखे और विश्वासघात से भरपूर रहा है। वे विश्वसनीय सहयोगी नहीं हैं। भाजपा विपक्ष में बैठती तो ज्यादा उचित रहता। मुफ्ती का साथ कहीं गले की हड्डी न बन जाए। मुफ्ती कश्मीर पर भारतीय पक्ष को उतनी दृढ़ता और मजबूती प्रदान करने में नाकाम रहे हैं। जिसकी आवश्यकता है। कश्मीर एक नाजुक मोड़ पर है। कोई भी जोखिम भारत को घायल कर सकता है।

  • प्रेम शंकर मालवीय, जबलपुर

दोषी कौन हैं?

व्यापमं पर हर दिन नए नाम सामने आ रहे हैं। इसका सूत्रधार कौन है किसी को नहीं पता। केवल आरोप ही आरोप हैं सच्चाई लापता है। अब तक किसी को सजा क्यों नहीं हुई। जांच इतनी लंबी खिंचने का क्या कारण है। व्यापमं के चलते अनगिनत बच्चों का भविष्य खराब हो गया। बहुतों की उम्र बीत गई। जो योग्य थे वे अपना हक पाने से वंचित रह गए और अयोग्य नेताओं, मंत्रियों, अफसरों की निकटता या भ्रष्टाचार के चलते महत्वपूर्ण पद पा गए। यह अन्याय अनंंत है।  न जाने कितने मासूमों की बलि ली जा चुकी है। ऐसी प्रणाली ही जनता के विश्वास को घायल करती है और अपराधों को बढ़ावा देती है। व्यापमं ने जिनको भटकने के लिए मजबूर किया है उनकी मंजिल कहां है? कोई है जो उन्हें सही रास्ता दिखा सके?

  • संकेत पालीवाल, इंंदौर

कोई भी बजट काम का नहीं

चाहे केंद्रीय बजट हो या मध्यप्रदेश का बजट-व्यापारियों का हित हर जगह सर्वोपरि है। किसी भी बजट ने किसानों और गरीबों के आंसू पूछने की कोशिश नहीं की। रोटी, कपड़ा, मकान पहले भी महंगा था और अब भी है। मध्यमवर्गियों के लिए शहरों में आवास खरीदना कठिन होता जा रहा है। गरीब तो खैर झुग्गी-झोपड़ी में रहने के लिए अभिशप्त हैं। उनका कोई पालनहार नहीं है। गरीबों को उनके दुष्चक्र से निकालने के लिए दूरगामी योजना का अभाव है। प्रधानमंत्री नरेगा जैसी योजनाओं को दुरुस्त करने के बजाय उनका उपहास करते नजर आते हैं। गरीबों की यही नियति है।

  • चिन्मय जरीवाला, दिल्ली