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हरियाणा में सियासी दांवपेंच चरम पर

हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को लेकर कांग्रेस में मंथन का दौर जारी है। हरियाणा में अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होने हैं और इन चुनावों में हुड्डा को कमान दी जाए या नहीं इसे लेकर भारी कश्माकश का दौर जारी है। खासकर चौटाला को सजा के बाद विपक्ष के कमजोर पडऩे के कारण कांग्रेस इस बात की तैयारी कर रही है कि हरियाणा की सियासत में अब उसका एकक्षत्र राज्य स्थापित हो जाए, लेकिन गोपाल कांडा जैसे तमाम प्रकरण हुड्डा के लिए खासी मुश्किल पैदा कर सकते हैं। इसी कारण कुछ नेता हुड्डा को हटाकर स्वयं अपना नाम आगे कर रहे हैं। फिलहाल महिला मुख्यमंत्री के रूप में शैलजा का नाम आगे बढ़ाया जा रहा है। शैलजा दलित तबके से आती हैं और महिला मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें प्रोजेक्ट करना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन पिछले कई उप चुनाव में कांग्रेस की हालत उतनी अच्छी नहीं रही है इसी कारण आलाकमान कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं। आलाकमान को लगता है कि प्रदेश में कोई बड़ा परिवर्तन न करते हुए हुड्डा के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाना चाहिए, लेकिन कई स्थानीय नेता हुड्डा के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं और क्योंकि उन्हें मैदान साफ दिखाई दे रहा है लिहाजा वे इस स्थिति का फायदा उठाना चाह रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी का इस क्षेत्र में कोई जनाधार नहीं है थोड़ा बहुत जनाधार है भी तो वह भी उतना पुख्ता नहीं है वह अन्य पार्टियों के भरोसे ही अपनी राजनीति करती आई है। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है कुछ एक प्रकरणों को छोड़ दें तो उसके खाते में विकास की बहुत सी उपलब्धियां दर्ज हैं। इसी कारण कांग्रेस फायदे में रह सकती है।
कांग्रेस के नजरिए से देखें तो अब मैदान साफ है। कुलदीप की जनहित कांग्रेस का पहले भी सिर्फ एक विधायक (खुद कुलदीप की पत्नी) है। भाजपा के चार। कांग्रेस को इन के 1 और 4 मिल कर 14 भी हो सकने की कोई सम्भावना नहीं दिखती। चौटाला छूट भी जाएं कांग्रेस को लगता है कि 30 से घट के 20 पे तो रह सकते हैं वो, 31 विधायक उनके नहीं होंगे और न छूटें तो फिर शायद 10-12 भी न जीतें उन की पार्टी के। जमानत मिल भी जाए तो सजा माफ या स्थगित होती तो किसी कांग्रेसी को नहीं लगती। कांग्रेस की सोच ये है कि चौटाला के अंदर रहते चुनाव हुआ तो भी उनका आंकड़ा 90 की विधानसभा में 20 को छू नहीं पाएगा। मोटे तौर पे आंकलन यही है कांग्रेस का। इसमें दस बीस प्रतिशत का अंतर भी हो तो भी चौटाला को 22-24 और हजका-भाजपा को 14-16 से ज्यादा सीटें मिलनी नहीं चाहिए। दो चार निर्दलीय और एकाध बसपाई भी अगर कहीं से जीत जाए तो भी पचास से अधिक सीटें कांग्रेस अपनी मान के चलती है। लेकिन ये आंकलन तब है कि जब ओमप्रकाश और अजय चौटाला अंदर ही रहें और आय से अधिक संपत्ति वाले केस में अभय भी जेल में हों। कांग्रेस का हिसाब किताब ये है कि बाप बेटे तीनों के अंदर चले जाने के बाद पार्टी का पूरी तरह से बैंड बज जाएगा और हजका-भाजपा तो खैर कोई मुकाबला करेंगे ही क्या! लेकिन लगता है कि कांग्रेस यहीं मार खा रही है। यहीं वो भूल रही है राजनीति में दो जमा दो या आठ माइनस चार कभी चार नहीं होते। अति आत्मातिरेक में उसे दिख ही नहीं रहा कि एक नई तरह का धु्रवीकरण नीचे शुरू हो भी चुका है।
गठबंधन के लिए चौटाला को तरजीह न देने वाले भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी, प्रदेश अध्यक्ष किशनपाल गूजर और हाईकमान प्रभारी विजय गोयल तीनों ही अब अपनी अपनी जगह नहीं हैं और जो हैं उन में से कोई भी चौटाला के खिलाफ एक शब्द भी बोल नहीं रहा। एक। दूसरी बात ये कि चौटाला अगर खुद चुनाव नहीं लड़ सकेंगे तो भी कांग्रेसी ये भी क्यों मान के चल रहे हैं कि वे राजनीतिक नज़रिए से सोचना, चलना भी बंद कर देंगे? अगर चौटाला को सुप्रीम कोर्ट तक से भी राहत न मिली तो वे अपनी जीत से ज्यादा कांग्रेस की हार को तरजीह देंगे। वे कतई नहीं चाहेंगे कि कांग्रेस विरोधी वोट विभाजित हों और वो फिर सरकार बना जाए। अदालत से राहत न मिलने और 2014 का भी चुनाव न लड़ सकने की सूरत में वे हजका के साथ होने के बावजूद भाजपा से गठबंधन करेंगे। ऊपर न सही, तो भीतर भीतर। उन के कार्यकर्ता कांग्रेस को मात देने की खातिर उन का कहा मानेंगे भी। ऐसा कोई तिहरा गठबंधन बना तो वो कांग्रेस पर बहुत भरी पड़ेगा। इसलिए भी कि जनता को चाहिए अगर विकल्प ही तो फिर ये बहुत सशक्त विकल्प होगा। ऐसा कोई गठबंधन हुआ तो फिर वो बीच में आने वाली किसी भी बसपा या अभी ठीक से पैदा भी नहीं हुए तृणमूल का समूल नाश भी कर सकेगा। इस तरह के समीकरण और गठजोड़ की संभावना है। कांग्रेस के कई नामी गिरामी नेता उस समीकरण की संभावना के मद्देनजऱ भाजपा के अभी से संपर्क में भी हैं। इसलिए भी कि 2014 के लोकसभा चुनावों में भी इन कांग्रेसियों को कांग्रेस यूपी, बिहार, बंगाल, आंध्र, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा और पंजाब जैसे राज्यों में कुछ हासिल करती नहीं लगती। अपने अपने इलाकों और जातियों में निर्विवाद असर वाले ये कांग्रेसी भाजपा में जा भी हुड्डा की ही वजह से रहे हैं। इन में एक वो धाकड़ कांग्रेसी नेता भी शामिल है जिसने हुड्डा को एक बार एक जाट बहुल शहर की जनसभा में हूट कराया था और जिस के बाद हुड्डा फूट फूट के रोए थे। पंजाब में कांग्रेस जीत सकती थी 2007 में अगर कैप्टन अमरेंदर सिंह ने चाहा होता। उन्होंने खुद ही नहीं चाहा। नटवर सिंह उन के सगे जीजा हैं और तेल घोटाले में उनकी बलि ताजी-ताजी चढ़ी थी। कैप्टन जानते थे कि कांग्रेस के जीतने पे कोई हो, वे मगर मुख्यमंत्री नहीं होंगे। अकालियों से सत्ता लेना शायद आसान होता उनके लिए। किसी कांग्रेसी से नहीं ले सकते थे। कांग्रेस बहुत थोड़े से अंतर से हार गई थी। हरियाणा की बात करें तो कांग्रेस में आज ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो सिर्फ इसलिए कांग्रेस का नुकसान कर देने पे आमादा हैं कि हुड्डा को सीएम नहीं होने देना है..!
बिंदु माथुर