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व्यापारियों के लिए

भूमि अधिग्रहण कानून किसानों के नहीं व्यापारियों के हित में है। भाजपा सरकार कहीं यह मान बैठी है कि भारी औद्योगीकरण से ही देश का भला होगा, लेकिन अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि ही जब विलुप्त हो जाएगी तो देश के आर्थिक ढांचे का क्या किया जाएगा। भूमि अधिग्रहण कानून में तमाम शर्तें डालकर सरकार ने अपना पक्ष मजबूत किया है पर जिन लोगों को इस कानून से लाभ मिलना चाहिए, वह तबका हर तरह के लाभ से वंचित है।

  • महेंद्र सारस्वत, धार

संदेहास्पद पहल

एमपीआरडीसी द्वारा मेडिकल कॉलेज बनाने की पेशकश गले नहीं उतर रही। आखिर यह विभाग इतना उतावला क्यों हो रहा है? सड़क निर्माण में ही कई खामियां हैं, इमारतों का निर्माण तो दूर की बात है। जिस कार्य का अनुभव नहीं उस कार्य को करने के लिए इतनी तत्परता कई सवाल पैदा कर रही है। मध्यप्रदेश में पीडब्ल्यूडी, हाउसिंग बोर्ड जैसे तमाम विभागों को निर्माण का पर्याप्त अनुभव है। उनके अनुभवों का लाभ लिया जाना चाहिए।एमपी-आरडीसी को सड़क बनाने में महारथ है, इसलिए वह सड़कें बनाए तो ही बेहतर है।

  • अनिरुद्ध चौहान, इंदौर

भोपाल में जरूरी है बदलाव

भोपाल को पेरिस बनाने से बेहतर है उसे भोपाल ही बना रहने दिया जाए। आज से चार दशक पहले का भोपाल ज्यादा बेहतर था। प्रारंभ से ही सही नियोजन किया जाता तो भोपाल पेरिस को भी मात कर देता। लेकिन जनसंख्या बढऩे के साथ-साथ जो व्यवस्थाएं की जानी थीं, वह भोपाल में नहीं हो सकीं। इसी कारण भोपाल एक समस्या प्रधान शहर बनकर रह गया है।

  • भूपेन्द्र यादव, भोपाल

जैसी करनी वैसी भरनी
टीनू जोशी और उनके पति ने जब गरीब जनता की गाढ़ी कमाई अपनी जेबों में भरी थी, उस वक्त उनका मुंह ढंका हुआ नहीं था। आज अदालत में मुंह ढंकने से क्या होगा, जब भ्रष्टाचार किया जा रहा था, उस वक्त अंतरात्मा कहां गई थी? भ्रष्टाचार की खासियत यह है कि इसे करने वाले हर व्यक्ति को कोई न कोई लॉजिक मिल जाता है। हर भ्रष्टाचारी अपने कुकर्म का औचित्य ठहराने की कोशिश करता है। कानून भी ऐसे हैं कि बचना आसान हो जाता है। लेकिन इस बार टीनू जोशी और अरविंद जोशी को सजा मिली तो समाज में एक मिसाल कायम हो सकेगी।

  • मिलिंद जोशी, उज्जैन

निवेश जरूरी, वादे नहीं
गुजरात में 25 लाख करोड़ के निवेश के वादे किए गए लेकिन निवेश कितने का होगा, कहा नहीं जा सकता। उद्योग जगत वादे तो कर जाता है, पर यह वादे जमीन पर नहीं दिख पाते। क्योंकि इस तरह के समिट के बाद जब उद्योगपति दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, तो उन्हें नौकरशाही और लालफीताशाही का चरित्र समझ में आता है। इस तरह के समिट कराने से बेहतर यह है कि साल में दो-चार बार सभी राज्य तथा भारतीय संघ नौकरशाही की बैठकें आयोजित कर उनसे इस बात पर चर्चा करें कि बिना किसी बाधा के उद्योग-धंधों को मनमाफिक माहौल कब मिल सकता है।

  • महेश माली, कटनी

गहरी साजिश

पाकिस्तान की बोट में जिस तरह विस्फोटकों के बाद आग लगी, उसने कई सवाल पैदा किए हैं। पाकिस्तान भारत को तबाह करने के मंसूबे पाले बैठा है। इसलिए भारत को समुद्री सीमाओं पर विशेष सतर्कता बरतनी होगी। भारत अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकता। लेकिन दुख इस बात का है कि सीमा पार से जो कुछ हुआ उस पर भारत के ही राजनीतिक दलों ने सवाल उठाने की कोशिश की।

  • सुब्रत शर्मा, कानपुर

फर्क नहीं पड़ेगा

किरण बेदी की दिल्ली में मौजूदगी से कोई विशेष फर्क नहीं पडऩे वाला। दिल्ली के मानस में ज्यादा बदलाव नहीं दिख रहा है। चुनाव के परिणाम लगभग वैसे ही आने वाले हैं जैसे 2013 में आए थे। बेहतर है कांग्रेस और आम आदमी पार्टी गुपचुप हाथ मिलाने की बजाए खुलकर मैदान में एकसाथ आ जाएं। जहां तक बेदी का प्रश्न है, दिल्ली के भाजपाई दिग्गज ही उनकी राह में कांटे बिछाने का काम कर रहे हैं। यदि भाजपा को बहुमत नहीं मिला तो मोदी की मुश्किलें बढ़ेंगी।

  • गगन अत्रे, दिल्ली

खतरे की घंटी
छत्तीसगढ़ में निकाय चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन खतरे की घंटी सिद्ध हो सकता है। यद्दपि निकट भविष्य में यहां कोई चुनाव नहीं है और सरकार के पास भी भूल सुधारने का पर्याप्त अवसर है। लेकिन फिर भी कांग्रेस की मजबूती भाजपा के लिए सरदर्द ही कहा जाएगा। वह भी ऐसे समय में जब कांग्रेस आंतरिक उठापटक से जूझ रही है।

  • मनमोहन त्रिपाठी, रायपुर

आयोग तो वही है
नीति आयोग भी योजना आयोग जैसा ही है। नाम अवश्य लंबा है, लेकिन इसकी कार्यप्रणाली का अंदाजा 6 माह के भीतर ही लग जाएगा। अरविंद पनगढिय़ा से बहुत उम्मीद है, देखना है वह नीति आयोग में क्या गुल खिलाते हैं।     

  • रवीश कुमार, जबलपुर