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यह मंतर नहीं चलेगा


जंतर-मंतर पर जो संतरे के समान एकता समाजवादी माँ के बिछड़े हुए सुपुत्रों ने दिखाई, वह टिकाऊ नहीं है। सैद्धांतिक रूप से यह सब एक-दूसरे से इतने दूर जा चुके हैं कि इनके बीच की एकता राजनीतिक अवसरवाद के सिवा और कुछ नहीं है। इस तरह की एकता समय के साथ खंडित हो जाती है। जनता को भी इसकी असलियत पता लग चुकी है। जनता इनके बहकावे में शायद ही आए। कांग्रेस की हालत निश्चित ही दयनीय है। यदि कांग्रेस पुनर्जीवित होना चाहती है तो उसे इन कथित धर्म-निरपेक्षतावादियों के चंगुल से निकलने की कोशिश करनी चाहिए।

  • संपूरण सिंह, उज्जैन

घर वापसी पर हंगामा क्यों?

हिंदुओं की घर वापसी ही हो रही है कोई धर्मांतरण नहीं किया जा रहा। यदि कोई स्वधर्म में लौटना चाहे तो उसे रोका नहीं जाना चाहिए। यह भूल सुधार है। भूल सुधारने से रोकना भी पाप है। भारत में करोड़ों हिंदू बान्धवों ने भय, प्रलोभन, धोखे के चलते अपना धर्म त्यागकर अन्य धर्म अपना लिया था। यह आध्यात्मिक रूपांतरण नहीं था, बल्कि भोले-भाले लोगों की एक तरह से सामूहिक ठगी ही थी। बहुतों को तो आज भी ज्ञात नहीं कि उन्होंने अपना धर्म क्यों त्याग दिया। ऐसे भोले-भाले लोग भूल सुधार कर रहे हैं तो इतना हंगामा क्यों है?

  • रमेश यादव, रायपुर

रिपोर्ट कार्ड से क्या फायदा

जब सारे ही मंत्रियों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है तो रिपोर्ट कार्ड निकालकर मध्यप्रदेश सरकार ने अपनी सच्चाई क्यों उजागर की? रिपोर्ट कार्ड में बढ़ा-चढ़ा कर दावे किए गए हैं लेकिन असलियत कुछ और है। खजाना खाली है, केंद्र में भी भाजपा की सरकार होनेे के बावजूद कोई मदद नहीं मिल रही है, सरकार लोकप्रिय योजनाओं पर इतना ज्यादा धन लगा चुक ी है कि विकास के लिए धन बचा ही नहीं है। इसलिए रिपोर्ट कार्ड खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं है।

  • चित्रकुमार रावत, इंदौर

खुलकर काम करने दें

हिंदूवादी संगठनों ने नरेंद्र मोदी के रास्ते में तमाम बाधाएं खड़ी की हैं। लव जिहाद से लेकर धर्मांतरण तक ऐसे कई मुद्दे हैं जिनके चलते भारत की अंतर्राष्ट्रीय धवि को पर्याप्त धक्का लगा है। मोदी प्रगतिशील विचारों के हैं और उनकी राह में इसी तरह बाधाएं उत्पन्न की जाती रहीं तो देश उनके दृष्टिकोण और कार्यों से लाभांवित नहीं हो पाएगा। जो लोग मोदी को सत्ता में देखना चाहते थे आज वे ही मोदी की राह में बाधा बनकर खड़े हैं, इसे विडंबना ही कहा जा सकता है।

  • मुर्तजा अली, बुरहानपुर

शेरों को क्यों मारा गया?

अखिलेश यादव शेर पालने का शौक रखते हैं तो उन्हें इस बात की भी ताकीद करनी चाहिए कि उनके प्रदेश में जिम्मेदार अधिकारी कितनी दक्षता और लगन से इस काम को अंजाम दे रहे हैं। जिस तरह चंद हफ्तों के भीतर लायन सफारी दो शेरों की कब्रगाह बन गई, उसे दखते हुए तो कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। जिन शेरों को ब्रीडिंग के लिए दूर-दूृर से लाया जा रहा है उन्हें लोहे के पिंजरे में ठूंस दिया जाता है और वे बुरी तरह घायल होकर संक्रमित हो जाते हंै, यही संक्रमण उनकी मौत का कारण बनता है। जो दो शेर मारे गए उन्हेंं कोई रहस्मय बीमारी नहीं थी, वे भी लापरवाही का ही शिकार हुए।

  • मुकेश धर्माधिकारी, लखनऊ

 

सिद्धांत कहां हैं?

अरविंद केजरीवाल 20 हजार रुपए में कॉफी पिला रहे हैं। कभी नरेंद्र मोदी ने मुफ्त में चाय पिलाई थी। लेकिन मोदी जिम्मेदारियों से भागे नहीं, उन्होंने चुनौतियों को स्वीकार किया। पर केजरीवाल की कॉफी थोड़ी संदेहास्पद लगती है। पिछली बार कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने के बावजूद केजरीवाल बीच रास्ते में दिल्ली की निर्दोष जनता को छोड़कर बनारस भाग खड़े हुए थे। इस बार वे वास्तव में गंभीर हैं तो कांग्रेस के साथ चुनावी तालमेल से चुनाव क्यों नहीं लड़ते। कम से कम चुनाव उपरांत धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पाखंड करने की आवश्यकता तो नहीं पड़ेगी।

  • देवव्रत शर्मा, दिल्ली

हर जगह भ्रष्टाचार

एमपीआरडीसी का पीपीपी मॉडल कुछ खास ठेेकेदारों को ही लाभांवित क्यों कर रहा है यह शोध का विषय हो सकता है। सारे देश मेें पीपीपी मॉडल के तहत जो काम हुआ है और मध्यप्रदेश में जो काम किया जा रहा है, उसकी गुणवत्ता में बुनियादी अंतर है। दुख तो इस बात का है कि जो लोग इस गुणवत्ता की परख के लिए तैनात हैं उनकी उदासीनता समझ से परे है। पीपीपी मॉडल के तहत निजी कंपनी या ठेकेदारों को काम पूरा करने के लिए जो समयसीमा दी गई है वह भी संदेहास्पद है। यह सारी प्रक्रिया भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है। लेकिन इसमें कुछ खूबियां भी हैं। इसलिए इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

  • नवनीत राजदान, दिल्ली

भाजपा नेता बाबूलाल गौर की वेट को लेकर चिंता जायज है। प्रदेश में और देश में भाजपा की सरकार बने अरसा बीता चुका है, लेकिन न तो कीमतें कम हुईं और न ही लोगों की जेबों में धन आया। केवल बातें करने से काम नहीं चलेगा, परिवर्तन ऐसा होना चाहिए कि जिसे जनता खुद महसूस करे। यदि ऐसा नहीं हुआ है तो कहीं न कहीं खामी है।

  • महेश राजपूत, भोपाल

गोलियों से खत्म नहीं होगा आतंक

आतंकवाद पर दोहरा रवैया अपनाना उचित नहीं है। जिस तरह पहले आतंकवादियों को हथियार देकर उन्हें ताकतवर बनाया गया और अब उन पर गोली बरसाकर उन्हें मौत के घाट उतारा जा रहा है, वह सर्वथा अनुचित है। आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और इसकी जड़ ताकतवर देशों की नासमझी में छुपी हुई है।

  • लक्ष्मीकांत माली, मुंबई