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मानसून का पूर्वानुमान

वर्षा का पूर्वानुमान मौसम विभाग तो लगाता ही है, ज्योतिष भी इसमें सक्षम है। मौसम विभाग करोड़ों रुपये व्यय करता है, परंतु अनुमान फिर भी गलत हो जाता है। ज्योतिष पर कोई व्यय नहीं होता, केवल ग्रहों की चाल पर गणना की जाती है फिर भी अनुमान किसी सीमा तक सही निकलता है। गणित ज्योतिष के निम्नलिखित सूत्रों का विश्लेषण कर वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। 1. जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, उस समय की ग्रह परिषद के अधिकारियों का प्रभाव 2. सूर्य का आद्र्रा नक्षत्र में प्रवेश 3. सप्तनाड़ी चक्र, त्रिनाड़ी 4. रोहिणी वास 5. ग्रहों की युति, दृष्टि व योगों का प्रभाव। इनके अतिरिक्त और भी सूत्र हंै जिनका उपयोग किया जा सकता है जैसे समय निकास, द्वादश नाग, सप्त वायु, चतुष्य स्तम्भ, वर्ष स्तम्भ, चतुर मेघ आदि।
मानसून और लोकवाणी
अपने देश में कृषि वर्षा पर विशेषकर मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। अतएव कृषि संबंधी अनेक कहावतें वर्षा होने या न होने का संकेत देती है। वर्षा के संबंध में ऐसी कहावतों का कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है, किंतु युगों-युगों से चली आ रही ऐसी परंपरागत कहावतों में अनुभव और बुद्धि का पुट है जिसकी वजह से आज के ग्रामवासी किसानों का इन पर अटूट विश्वास है। इस प्रकार की कहावतों के पीछे कोई घटना या कथा नहीं है, पर ये काफी लोकप्रिय हो गई है। खेती के लिए खेती अनुकूल अथवा प्रतिकूल मौसम के अनुमान तथा भविष्यवाणी संबंधी प्रचलित कहावतों को यहां संजोया गया है।
सावन शुक्ला सप्तमी, छुप के उगे भान,
घाघ कहे घाघिन से, छप्पर उपजे धान।
ऐसी मान्यता है कि सावन मास की शुक्ल सप्तमी को सूरज बादलों में छिपकर उदय हो तो सावन महीने में ही भारी वर्षा की संभावना है जिससे छप्पर पर भी धान के गिरे दानों से पौधे उग जाएंगे।
अगहर खेती अगहर मार।
घाघ कहैं वो कबहुं न हार।।
इस कहावत में दो बातों को एक साथ रखा गया है। खेती और मारपीट के मामलों में पहल करने वाले लोग कभी नहीं हारते। साधारणत: यह ठीक है कि लड़ाई झगड़े में पहल करने की नीति को सर्वत्र श्रेय दिया गया है। खेती के मामले में हमेशा अगहर होना लाभदायक नहीं होता। फिर भी खेती में आगे या पहले बौनी करने से लाभ की संभावना अधिक रहती है।
आम्बाझौर बहै पुरवाई।
तौ जानो बरखा रितु आई।।
यदि कुछ दिनों तक जोरों के साथ पुरवा हवा चले तो समझना चाहिए वर्षाऋतु आने वाली है। यह बात उत्तरी और पूर्वी भारत के लिए सही है परंतु पश्चिमी भारत में पश्चिमी हवा से भी पानी बरसता है। पुरब हवा में नमी होती है, जो बंगाल की खाड़ी के उठे हुए मानसून पवन के साथ चलती है। इस कहावत में आम्बाझौर शब्द सारगर्भित है। आमों की झौर गिराने वाली तेज हवा जो पूर्व से आती है, होली के आस-पास बैसाख तक सूखी पछुवा हवा बहती है जिससे पेड़ों के पत्ते झर जाते हैं। चैत्र बैसाख में आम फलते-फूलते हैं। जेठ-आषाढ़ में पुरवा हवा चलने लगती है। जब लगातार यह हवा काफी दिनों तक चले तो समझना चाहिए कि वर्षा होगी। मौसम संबंधी यह एक महत्वपूर्ण संकेत है।

राधाकांत भारती की किताब मानसून पवन : भारतीय जलवायु का आधार