ratangarh

क्लीन चिट या लीपापोती

मध्यप्रदेश के रतनगढ़ में हुये हादसे के बाद आईएएस अधिकारी एम. गीता एवं अन्य को क्लीन चिट मिलना तय है। आचार संहिता के चलते मंत्रिमंडलीय उपसमिति की जो बैठक नहीं हो सकी थी वह पिछले पखवाड़े संपन्न हो गई। जिसमें एम गीता एवं अन्य को मंत्रिमंडल की उपसमिति ने निर्दोष करार दे दिया। अब यह रिपोर्ट जल्द ही कैबिनेट में अनुमोदन के लिये रखी जायेगी। उसके बाद इस रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा जायेगा और हादसे में मारे गए अपराधियों को दोषमुक्त मान लिया जायेगा। छत्तीसगढ़ कैडर की एम गीता उसी दिन से विवादों में हैं जब से वे छत्तीसगढ़ के नाम पर येन केन मप्र में ही नौकरी कर रही थीं। राज्य सरकार ने उन्हें हाल ही में रिलीव कर दिया है और उनका दामन भी साफ कर दिया गया है। कुल मिलाकर रतनगढ़ हादसा जिसमें लगभग 50 जानें गईं। बगैर किसी जिम्मेदारी के समाप्त हो जायेगा। देखा जाये तो इस हादसे के बाद न तो किसी को सजा हुई और न ही किसी की जिम्मेदारी तय हुई। पुलिस तथा प्रशासन शांत बने रहे।
सभी हादसों में जांच की मांग की जाती है पर खानापूर्ति के सिवा कुछ नहीं होता। जिम्मेदार लोग बच निकलने का रास्ता तलाश ही लेते हैं। 
आखिर सजा मिले भी तो कैसे जब तक सत्ता के शीर्ष पर बैठे आका खुद गुनहगार अफसरों को बचाने के लिए सारी नैतिकता और जवाबदेही को ताक पर रखने के लिए ‘नजदीकियों के चलतेÓ आमादा बैठे हो तब तक चाहे वो धाराजी देवास हादसे के समय एसपी रहे आरके चौधरी हों चाहे रतनगढ़ में 2006 हादसे के समय वहां की कलेक्टर रहीं एम. गीता या फिर रतनगढ़ के हालिया हादसे के समय कलेक्टर, एसपी रहे संकेत भोंडवे व चंद्रशेखर सोलंकी, अमूमन होता यह है कि ऐसे हादसों के समय तत्कालीन आक्रोश को शांत करने के लिए न्यायिक जांच आयोग बना दिए जाते हैं और फिर बाद में जांच रिपोर्टें भी दफन कर दी जाती हैं। पूर्व में 2006 को जब यह हादसा हुआ था उसके बाद जूडिशियल कमीशन बिठाया गया था। कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में साफतौर से लिखा है कि यह दुर्घटना बड़ी दुर्घटना है इसमें 50 से अधिक लोगों की मौतें हुई थी उस समय तत्कालीन कलेक्टर एम गीता और पुलिस अधीक्षक प्रमोद वर्मा हुआ करते थे। इन दोनों पर तो कोई कार्रवाई सरकार ने नहीं की।  एम. गीता को जांच रिपोर्ट में साफतौर से दोषी मानने पर भी निलंबित नहीं किया गया। बल्कि उन्हें बचाने की भरसक कोशिश की गई।
7 अप्रैल 2005 को देवास के धाराजी हादसे के समय प्रशासन की लापरवाही के चलते इंदिरा सागर बांध से छोड़े गए जल में 200 से ज्यादा लोगों की जल समाधि हो गई थी। उसके बाद आनन-फानन में जांच बिठाई गई और इस बारे में एक परिपत्र 28 जुलाई 2005 को गृह मंत्रालय ने जारी किया। इस परिपत्र में धाराजी की घटना को देखते हुए लिखा था कि जुलूस, मेला और धार्मिक  आयोजनों के संबंध में जल संसाधन विभाग के अधिकारियों को आवश्यक रूप से आमंत्रित करें ताकि डाउन स्ट्रीट से बहने वाले पानी या बांधों से छोड़े गए पानी के लिए जल संसाधन विभाग पर्याप्त व्यवस्था कर सके और कि आसपास के गांवों को इसकी सूचना देने का इंतजाम किया जाए। गृह विभाग के इस परिपत्र के बाद भी दुर्घटनाएं होती रहीं। परिपत्र के जारी होने के लगभग 8 माह बाद ही 2006 में रतनगढ़ हादसे में 50 के करीब शृद्धालु मारे गए। अभी पुरानी घटना की जांच ठंडे बस्ते में पड़ी हुई थी और नई घटना में रतनगढ़ मंदिर में भगदड़ मचने के कारण पुन: 115 लोगों की मौत हो गई और जिला प्रशासन मुंह ताकता रह गया। एक ही जगह पर दोबारा घटना होना सिर्फ जिला प्रशासन की उदासीनता का प्रतीक ही नहीं बल्कि प्रशासनिक अराजकता का भी प्रतीक है।
दतिया स्थित रतनगढ़ मंदिर में 2006 के हादसे के समय जो जांच आयोग बैठा था उसने अपनी रिपोर्ट कैबिनेट को दे दी थी। कैबिनेट ने इस मामले को सुनने के लिए तीन मंत्रियों की उप समिति बनाई थी। जांच आयोग ने अपनी फाउंडिंग में साफतौर से यह लिखा था कि बड़ी दुर्घटना है ज्यादा लोगों की मौत हुई है अधिकारियों की उदासीनता दंडनीय है। साथ में गृह विभाग का परिपत्र जो व्यवस्था के संबंध में था, उसमें लिखा है कि तत्कालीन कलेक्टर एम गीता ने उसका पालन नहीं किया। जांच आयोग की अनुशंसा को मंत्रीमंडल की उप समिति और विभाग ने भी अपनी मोहर  लगा दी। परंतु मौत के दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। बल्कि वह रिपोर्ट ही पिटारे में बंद पड़ी रही चुनाव हो जाने के बाद सरकार ने उक्त जूडिशियल इंक्वायरी से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि नई सरकार बन गई है पुराना मंत्रीमंडल भंग हो गया है पूरे मामले की जांच दोबारा से कराई जाना उचित होगा। परंतु सरकार के ही मुख्य सचिव ने पुरानी रिपोर्ट का हवाला  देते हुए उक्त घटना पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे मामले की जांच 4 मंत्रियों की उप समिति ने कहते हुए एम गीता सहित अन्य को क्लीन चिट दे दी है।