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विपरीत कोण भी आपस में बराबर होते हैं!

मैंने चौराहे पर आज एक राजनीतिक दल का जुलूस देखा। जिसकी अगुवाई करना एक सज्जननुमा नेताजी के हाथ में था,

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‘हवा खाईये

शीर्षक पढ़कर घबरा तो नहीं गये, घबराईये नहीं, हम तो आपको सुबह की ताजी-ताजी मधुर-मधुर, भीनी-भीनी माटी सुगंधित हवा खाने

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निंदक नियरे राखिए, अड़ोसी-पड़ोसी बनवाए

अब क्या कहूं कबीरदास जी को? खुद तो जो कुछ भुगतना था, भुगता और चले गए, लेकिन दूसरे लोगों के

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प्रदर्शनकारियों पर निठल्ला चिंतन

भारत प्रदर्शनकारियों का देश है। वीर प्रदर्शनकारियों का। यहां ऐसे-ऐसे वीर सपूत हैं, जो वेलेंटाइन डे पर अपनी असीम ऊर्जा

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